शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

इस्लाम मे कुरबनी पर्यावरण को संतुलन बनाए रखने मे कारगर

इद उल आज़हा एक इबादत समाजियात ओर कानुने फितरत के ऐन मुताबीक


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एक समाजीक संस्था के ज़रिये पिछले दिनो देहली ओर मुल्क के दिगर मकामात पर भी एक पोस्टर चसपा किया गया जिसमे एक बकरे की तसविर हें जिसके निचे लिखा हे।

मे गोश्त नही जीव हूँ Go Vegan 

धियान देने वाली बात यह हें के ऐसे बोर्ड ईद उल आज़हा के वक्त ही क्यो नज़र आते हें इस के ऐलावह हर रोज़ पुरे भारत में लाखो करोडो बकरे बैंसे मुर्गी ओर दुसरे जानवर गोश्त के लिए काटे जाते हें तब उन लोगो को जीव हत्तीया की कोई खबर नहीं होती कोई फिक्र नहीं होती आज भारत बिफ एक्सपोर्ट में दुनियां मे नं एक पर हें जो लाखो मेटरीक टन मास तमाम दुनिया को एक्सपोर्ट करते हें। जिस मे 10 सब से बडी कम्पनीया वह हें जिनके मालिक मुस्लिम नहीं हें ओर यह लोग इस के ज़रिये अर्बो रुपये का कारोबार करते हें कुछ लोगो के ज़रिए बलके एक खास नज़रयाती पार्टी ओर इसी ज़ेहनियात की पार्टीयो की जानिब से यह ग़लत ओर नफरत भरा प्रोपेगेंडा लगातार चलाया जाता रहा हें के एक खास मज़हब के लोग ही इस बात को सही मान भी लिया जाए तो इन की तादाद भारत मे 15 18 % जो अकसर मास खाते हें मुलनिवासी 65 हें उस मे से अधिक तर मास खाते हें अब बचे उची ज़ात के लोग  उस मे से भी 12 13 % मे से भी कुछ खाते हे आब आते हे ब्राह्मणो पर कशमीर , बंगाल, ओर साउथ इण्डीया में यह लोग जीव हत्तीया करते हे या इस के वजह बंते हे ओर आगर इतनी बडी आबादी भारत मास खोर ना होती तो सब्ज़ीया के दाम चार से पाच गुनाह बडे जाते सिर्फ टमाटर को ही लें पाच रुपये से बड कर 80 ओर 100 रुपये किलो तक भाव चड तै दिखे जाते हें जहा तक ईद उल आज़हा के वक़्त कुर्बानी का ओर इस के असरात वा नताईज का सवाल हें दुनिया ओर मिल्लाते स्लामिया पर। यह बहुत कुदराती हें कुतराती वासाईल (खुराक) का प्रयोग कुदराती तरीके से
कुदरत ने यह निज़ाम कायम किया हें के जंगलो मे भी चोपाए जानवरो मे नर जानवर किसी झुँड या गिरोह मे गिंती के ही होते हे जबके मादाओ की तादाद इन से कही गुना ज़ादा होती हे किसी झुँड मे सिर्फ वही नर आम तोर से तमाम मादाओ के साथ ताल्लुक बाना पाता हे। जो सब से ज़ादा जासीन, ताकतवर ओर तजुरबे कार होता हे।  यानी सबसे ज़ादा बेहतर जेनेटिक खुबियो का मलिक होता हे जब के झुँड मे मादाओ की तादाद हमेशा काई गुना ज़ादा होती हें ये कुदराती निज़ाम हें के उन के ज़रीये सेहत मंद जिंस आगली नसलो को पोहचाता हे इस कुदराती उसुल को किसान ओर वह लोग इन जानवरो को पालते हें यह भी एक दो नर जो सेहत मंद ओर अच्छी नसल के होते हे उन हे बचा कर बकी को फरोखत कर देते हे इस से इनहे गेर ज़रूरी बोझ से छुटकारा मिल जाता हे ओर वही चारा दुसरे दुध देने वाले जानवरो के काम आता हें इस के ऐलावा उन हे बाडा माआशी फायदा भी होता हें यह जानवर जब बूचड़ खानो मे या व्यक्तिगत तोर पर ज़िबह होते हें तो मुल्क के ग़िज़ाई सिस्टम को मज़बूत करते हे इद उल आज़हा के लिए काई किसान ओर लोग व्यक्तिगत तोर पर भी मवेशी पालते हें ओर फिर इस मोके पर बहुत अच्छी कीमत पर बेच देते हे जो कीमत आम दिनो मे नहीं मिलपाती हे के कुर्बानी का जानवर आकीदे इबादत के तेहत खरीदे जाते हें यहा कारोबारी ज़हन नहीं होता इस लिए कुर्बानी के जानवर की वह कीमत मिलजाती हे जो आम हालात मे कसी सुरत मुमकिन नही इस तरहा मवेशी पालने वाले काफी अच्छी कमाई कर लेते हें फिर इन जानवरों के लिए चारे की ज़रुरत होती हें ओर उन दिनो अचानक एक रोज़गार खडा हो जाता हें जिस मे गरीब तबका अच्छी खासी रकम कमा लेता हें फिर खाल आतो ओर दुसरी चिज़ो का कारोबार हे जिस से काई लोग जुडे होते हे इनहे भरपुर काम मिलता हे ओर खाल के कारोबारी को बडा मुनाफा
गोशत जेसा के स्लाम मे हुकम हे जानवर मे एक हिस्सा खुद का एक रिशदेदार का एक ग़ुराबा वा मसाकीन होता हे रिश्तेदारो मे भी कुर्बानी का गोश्त उनही के यहा पोहचाया जाता हे जिस के यहा कुर्बानी ना हुई हो ज़ाहीर हें वह सहेबे निसाब नहीं हो इस तरहा दो तिहाई हिस्सा गुराबा को मिलता हे ओर इस तरहा यह लोग भी मेहगा ओर कीमती गोश्त जी भर कर खाने को मिलजाता हे यहा पर गोर करने की बात यह हे वह यह के स्लाम मे कोई भी तेवहार यानी खुशी यानी ईद के मोके पर आपनी खुशी से ज़ियादा गुराबा मसाकीन के हक को एहमियत दी हें
इन दिनो बडी चतुराई से यह फेलाया जा रहा हे के मासा हार गलत हे जिस मे रोशन खयाल इस मे शामिल हो गए हे के जानवरो की कुर्बानी करने के बजाए इस साल रकम को सदकह कर दिया जाए सदका ओर नेकी के काम करने के लिए आप हर वक्त आज़ाद हैं भला किस ने रोक हे फिर सदके का मतलब यह हमने सिर्फ यह समझ रखे हे के मदरसे मे दे दिया जाए ओर इस माल का किया होता हें हम सब खुब अच्छी तरहा जांते हे क्या यह मदारीस इन मोलवीयो की निजी जाएदात नहीं बन गई जो इनके वारेसिन को मुनतकील हो जाती हें जबके गोश्त हर हालत मे ग़ुराबा को पहुचता हे ओर यही दिन इस्लाम का मक़सद भी हे
डाॅ फय्याज़ फेज़ इन्दोरी
उर्दू से हिंदी : शाहनावाज़ खान शान्नू

عیدالاضحی ایک عبادت ۔۔جوسماجیات اور قانونِ فطرت کے عین مطابق ہے

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ایک سماجک سنستھا کے ذریعے پچھلے دنوں دہلی اور ملک کے دیگر مقامات پر بھی ۔ایک پوسٹر چسپاں کیا گیا ۔۔۔۔جس میں ایک بکرے کی تصویر ہے جسکے نیچے تحریر ہے
"میں گوشت نہیں جیو ہوں "

دھیان دینے والی بات یہ ہے کہ ایسے بورڈ عیدالاضحی کے وقت ہی کیوں نظر آتے ہیں ۔۔۔۔؟؟
اس کے علاوہ ہر روز پورے بھارت میں لاکھوں کروڑوں بکرے ،بھینس ،گائے ،مرغی اور دوسرے جانور گوشت کے حصول کے لئے کاٹے جاتے ہیں ۔تب ان لوگوں کو جیو ہتیا کی کوئی خبر نہیں ہو تی ۔کوئی فکر نہیں ہو تی ۔آج بھارت بیف اکسپوٹ میں ۔دنیا میں نمبر ون پر ہے جولاکھوں میٹرک ٹن گوشت ۔۔۔بیف،بھیڑ ،بکری ،اور مرغی وغیرہ کا تمام دنیا کو اکسپورٹ کرتا ہے ۔۔۔
جسمیں سات سب سے بڑی کمپنیاں وہ ہیں جنکے مالک   ہندو    ہیں ۔اور یہ لوگ اس کے ذریعے اربوں روپے کاکاروبار کرتے ہیں ۔۔۔
کچھ لوگوں کے ذریعے بلکہ ایک خاص نظریاتی پارٹی اور اس سکتی ذیلی پارٹیوں کی جانب سے یہ غلط اور تعصب بھرا پروپیگنڈہ لگاتار چلایا جاتا رہا ہے کہ ۔ایک خاص مذہب کے لوگ ہی گوشت کھاتے ہیں ۔اور جیو ہتیا کرتے ہیں ۔۔
اگر اس بات کو صحیح مان بھی لیا جائے تو ان کی تعداد بھارت میں 15   -18    %    ہے اس میں بھی اکثر ایسے ہیں جو گوشت نہیں کھاتے ۔
اسکے علاوہ    65    %   جو مول نواسی ہیں وہ سب گوشت کھاتے ہیں ۔۔
اب بچے اونچی ذاتِ کے لوگ (منوواد کے حساب سے )اس میں بھی     12 -13    فیصد چھتری ،راجپوت ،مراٹھے وغیرہ میں اکثر بلکہ ذیادہ تر گوشت خور ہیں ۔۔
اب آتے ہیں برہمنوں پر کشمیر ،بنگال اور ساؤتھ انڈیا میں یہ لوگ بھی گوشت کھاتے ہیں ۔۔
یعنی یہ سب لوگ جیو ہتیا کرتے ہیں ۔یا اس کی وجہ بنتے ہیں ۔۔
اور اگر اتنی بڑی آبادی بھارت  گوشت خور نام ہوتی تو سبزیاں آج سو روپے اور دوسو روپے بک رہی ہو تی ۔ذرا سا موسم بدلنے پر بارش اور گرمی میں سبزیوں کے دام چار سے چھے گنا بڑھ جانے ہیں ۔صرف ٹماٹر کو ہی لیں ۔پانچ روپے سے بڑھ کر  80   اور    100  روپے کلو تک بھاؤ چڑھ تے دیکھے جاتے ہیں ۔۔
جہاں تک عیدالاضحی کے وقت قربانی کا اور اس کے اثرات و نتائج کا سوال ہے ۔دنیا اور ملت اسلامیہ پر ۔یہ بہت نیچرل ہے ۔قدرتی وسائل (خوراک )کا استعمال قدرتی طریقے سے ۔۔
قدرت نے یہ نظام قائم کیا ہے کہ جنگلوں میں بھی چوپائے جانوروں میں نر جانور کسی جھنڈ یا گروہ میں گنتی کے ہی ہوتے ہیں جبکہ ماداؤں تعداد ان سے کئی گنا زیادہ ہوتی ہے ۔کسی جھنڈ میں صرف وہی نر عام طور سے تمام ماداؤں کے ساتھ تعلق بنا پاتا ہے ۔جوسب سے زیادہ جسیم ،طاقتور اور تجربہ کار ہوتا ہے ۔یعنی سب سے ذیادہ بہتر جنیٹک خوبیوں کا مالک ہوتا ہے ۔جبکہ جھنڈ میں ماداؤں کی تعداد ہمیشہ کئی گنا ذیادہ ہوتی ہے ۔یہ ایک قدرتی نظام ہے جو انکے صحت مند جینس اگلی نسلوں کو پنہچاتا ہے ۔۔
اسی قدرتی اصول کو کسان اور وہ لوگ جو ان جانوروں کو پالتے ہیں اپناتے ہیں ۔
یہ بھی ایک دو نر جو صحت مند اور اچھی نسل کے ہوتے ہیں انہیں بچا کر باقی کو فروخت کر دیتے ہیں ۔۔اس کا انہیں غیر ضروری بوجھ سے چھٹی مل جاتی ہے ۔اور وہی چارہ دوسرے دودھارو جانوروں کے کام آتاہے ۔اسکے علاوہ انہیں بڑا معاشی فائدہ بھی ہو تا ہے ۔
 یہ جانور جب بوچڑ خاںوں میں ذبح ہوتے ہیں ۔یا انفرادی طور سے ذبح کئے جاتے ہیں تو ملک کے غذائی سسٹم کو تقویت پنہچاتے ہیں ۔۔۔
بقراعید   عیدالاضحی کے لئے کئی کسان اور لوگ انفرادی طور پر بھی مویشی پالتے ہیں ۔اور پھر اس موقعے پر بہت اچھی قیمت پر فروخت کرتے ہیں ۔جو قیمت عام دنوں میں نہیں مل سکتی ۔کہ قربانی کا جانور عقیدئے عبادت کے تحت خریدا اور لیا جاتا ہے ۔یہاں کاروباری ذہن نہیں ہو تا ۔اس لئے قربانی کے جانور کی وہ قیمت مل جاتی ہے جو عام حالات میں کسی صورت ممکن نہیں ۔اس طرح مویشی پالنے والے کافی اچھی کمائی کر لیتے ہیں ۔جو مجموعی اربوں روپے پر مشتمل ہوتی ہے ۔۔
پھر ان جانوروں کے لئے چارے کی ضرورت ہوتی ہے ۔اور ان دنوں اچانک ایک روزگار کھڑا ہو جاتا ہے ۔جس میں غریب اور مزدور طبقہ کروڑوں روپیہ کما لیتاہے ۔پھر کھل آنت اور دوسری چیزوں کا کا کاروبار ہے جس سے لاکھوں لوگ جڑے ہوئے ہیں ۔انہیں بھرپور کام ملتا ہے ۔اور کھال کے ویوپاری کو بڑا منافع ۔۔

گوشت جیسا کہ اسلام میں حکم ہے جانور میں ایک حصہ خود کا ایک رشتہ داروں کا ۔اور ایک غرباء ومساکینونکا ہوتا ہے ۔رشتہ داروں میں بھی قربانی کا گوشت انہیں کے یہاں پنہچایا جاتا ہے جس کے یہاں قربانی نا ہوئی ہو ۔ظاہر ہے وہ صاحبِ نصاب نہیں ۔اس طرح دو تہائی حصہ غرباء کو ملتا ہے ۔اور اس طرح یہ لوگ بھی منہگا اور قیمتی گوشت جی بھر کر کھا لیتے ہیں ۔یہاں پر غور کرنے والی جو بات ہے ۔وہ یہ کہ اسلام میں کوئی بھی تہوار ،یعنی خوشی ،یعنی عید ۔کے موقعے پر پیسوں کا زیاں نہیں ہوتا ۔بلکہ اپنی خوشی سے زیادہ غرباء و مساکین کے حق کو اہميت دی گئی ہے ۔
قربانی کو بعضے فرض اور اکثر واجب قرار دیتے ہیں ۔(صاحبِ نصاب کے لئے )  یعنی یہ عبادت میں شامل ہوئی اور عبادت کا کوئی بدل نہیں ۔ایک بات ان دنوں بڑی شدومد کے ساتھ پھیلائی جا رہی ہے جس میں ہمارے روش خیال اشخاص بھی شامل ہو گئے ہیں ۔کہ جانوروں کی قربانی کرنے کے بجائے اس رقم کو صدقہ کر دیا جائے ۔۔۔۔۔۔
صدقہ اور نیکی کے کام کرنے کے لئے آپ ہر وقت آزاد ہیں ۔بھلا کس نے روکا ہے ۔۔۔
پھر صدقے کا مطلب یہ مطلب ہم نے صرف یہ سمجھ رکھا ہے کہ مدرسے میں دے دیا جائے ۔اور اس مال کا کیا ہوتا ہے ۔ہم سب خوب اچھی طرح جانتے ہیں ۔۔۔
کیا یہ مدارس ان مولویوں کی نجی جائدادیں نہیں بن گئیں جو انکے وارثین کو منتقل ہو جاتی ہیں ۔جبکہ گوشت ۔ہر حالت میں غرباء کو پہنچتا ہے اور یہی دینِ اسلام کا مقصد بھی ہے ۔۔۔

ڈاکٹر فیاض فیض اندور
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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Urdu removed from Dehradun railway station sign board BJP

Urdu removed from Dehradun railway station sign board BJP



सम्बित पात्रा ने एक ट्विट करा देहरादून के रेलवे स्टेशन पर लगे साइन बोर्ड का जिसमें उर्दू गायब थी ओर उसकी जगह संस्कृत थी संस्कृत लिखी हुई थी इस से कोइ तकलीफ नही हे ओर ना होनी चाहिए क्यो की भाषा से केसी तकलीफ संस्कृत भी लीख देते ओर होना भी चाहिए क्यो की भारत की सबसे पुरानी भाषा हे लेकिन उन को इतनी समझ कहा ओर जब इंसान नफरत में डूब जाता हे तो उस के सोचने समझ ने की ताकत खत्म हो जाती हें उन की यह नफ़रत पे कोई ताज्जुब नहीं हें लेकिन उन हे यह ज़रुर समझना होगा की भाषा संवाद के लिए होती हे जिस से आप आपने विचार एक दुसरे से व्यक्त करते हे आपनी भावना,विचार, इरादे व्यक्त करने हेतु होती हें इस पर किसी धर्म,जाती,पंत के लोगो का अधिकार नही होता सभी सीख सकते हे तथा बोल,लिख सकते हें ओर उर्दू भाषा भारत मे ही जन्मी हे यही की भाषाओं ओर फार्सी अर्बी के शब्दों को मिला कर बनी हें जो भी हो किसी भाषा से इतनी नफरत क्यो भाषा तो एक प्रतिभा,कौशल हे भाषा से केसा बेर,नफरत,घर्णा वोतो एक दुसरे के करीब लाने के लिए होती हे हर भाषा का अपने आप मे महत्व होता हें भाषा छेत्र की होती हे किसी धर्म,जाती,पंत की नही होती हें हर छेत्री भाषा को महत्व ओर बडावा देना चाहिए क्यो की उस से उस छेत्र के लोगो का लगाव होता हें हर कोम की कामयाबी उस की भाषा के विस्तार पर निर्भर करती हें यही वजा हे के वेस्टर्न मुल्क इतनी तरक्की कर रहे हें चाईना ओर अन्य देशो मे उनकी ही मात्र भाषा मे ही शिक्षा दी जाती हें ओर हमारे देश यानी हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी भाषा को बहुत ज़ादा महत्व दिया जाता हे जिस कारण छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए पेहले तो अंग्रेजी सीखना पड़ती हे उस के बाद शिक्षा प्राप्त कर सकते हे जिस करण भारत मे अशिक्षा का रेशो अधिक हें यदि यही शिक्षा हिंदी,उर्दू,पंजाबी,गुजराती, मे होतो भारत ओर तरक्की कर सकता हे हम अब मुद्दे पर फिर आते 

बेहर हाल ओरो से कोई गिला शिकवा नहीं क्यो की उर्दू के साथ खुद मुस्लिम समाज ने कोनसा इंसाफ़ किया हें हमारे नौजवान नसल मे भी कोई दिलचस्पी नहीं हे उर्दू के साथ हमारा भी रवैया कोई बहोत अच्छा नहीं हे ओर इस हालत के सबसे बडे ज़िम्मेदार हमारी स्कूल की शिक्षा व्यवस्था हें उर्दू वा दिनयात भी पढ़ाई जाती हे यह सिर्फ नाम के लिए हें जिन स्कूल मे पढाई जाती हे वहा के बच्चे12वी कक्षा पास कर चुके होते हे ओर उनहें उर्दू लिखना तो दुर पढना भी नहीं आती हें हमारे भी दुकानो के बोर्ड से उर्दू गायब हें स्कूल शिक्षा से हर जगह से गायब हे इस के ज़िम्मेदार सिर्फ ओर सिर्फ हम हें 
उर्दू को ज़िंदा सिर्फ रेलवे स्टेशन के साइन बोर्ड पे लिख जाने से नहीं होगी इस से कुछ आगे बड कर काम करना पडेगा हमारे नौजवान नसल को उर्दू की ऐहमीयत बतानी होगी उन को उर्दू सिख ने के लिए उभारना पड़ेगा उस के लिए उर्दू की प्रतियोगिता करनी होगी जिस से उन को उर्दू सीख ने में दिलचस्पी पेदा होगी ओर अन्य भी कार्य कर सकते हैं जो उर्दू को बडावा दे शुक्रिया
शाहनावाज़ खान शान्नू

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#اردو

آج سمبیت پاترا نے ایک ٹویٹ ۔۔۔۔دہرادون کے ریلوے اسٹیش پر نصب بورڈ کا ۔۔۔جس میں اردو غائب تھی ۔۔اور اسکی جگہ سنسکرت تھی ۔ان کی اس نفرت پے ہمیں کوئی تعجّب نہیں ۔۔کہ یہ انکا سیاسی اجینڈا ہے ۔۔

لیکن لیکن اردو کے تعلق سے آج ہمارے یہاں اور خصوصاً نوجوان نسل میں بھی ادم دلچسپی کا رویہ دیکھا جاتا ہے ۔۔
اور ان حالات کے ذمدار ہم خود ہیں ۔۔۔دوسرے سب سے بڑے ذمدار اس تعلق سے ہمارے تعلیمی ادارے ہیں ۔۔جو پوری طرح ہمارے پاس ہیں ہمارے خود کے ہیں ۔جن پر ہمارا مکمّل اختیار بھی ہے ۔۔
"اردو اور دینیات کی تعلیم دی جاتی ہے "
یہ جملہ اکثر اسکولوں کے داخلہ فارم پر لکھا پایا جاتا ہے ۔۔ لیکن ہوتاکیا ہے ۔
وہ بچہ جو ہمارے اسکول سے پڑھ کر نکلتا ہے ۔۔ان میں ذیادہ تر ۔نہ دوسطور پڑھ سکتے ہیں ۔اور نا ہی ایک سطر لکھ سکتے ہیں۔
ایسا کیوں ہے ۔۔یہ ایک الگ اور طویل بحث کا موضوع ہے ۔۔۔
دوسری سب سے بڑی وجہ آج ہمارے علاقوں سے بازار میں دکانوں سے اردو میں لکھے بورڈ غائب ہیں ۔
اس سب کا ذمدار کون ہے ۔؟؟؟؟

شاہ نواز خان   شنو
ہندی سے ترجمہ ۔۔۔
ڈاکٹر فیاض فیض