रविवार, 31 मई 2026

सुन्नातो भरा आसान निकाह कैसा हो ?

 सुन्नातो भरा आसान निकाह कैसा हो?


इस्लाम में निकाह (शादी) सिर्फ दो जोड़ो का मिलन नहीं है बल्कि यह एक बहुत ही मुकद्दस और पसंदीदा इबादत है नबी की सुन्नत है । यह सिर्फ़ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा, सुकून, मोहब्बत और रहमत का ज़रीया है।


क़ुरआन में निकाह की अहमियत और मक़सदक़ुरआन पाक में अल्लाह तआला फरमाता है: "और उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से जोड़े (जोड़े) बनाए ताकि तुम उनसे सुकून हासिल करो, और तुम्हारे दरमियान मोहब्बत और रहमत क़ायम की। बेशक इसमें निशानियां हैं उन लोगों के लिए जो ग़ौर-फ़िक्र करते हैं।" 

(सूरह अर-रूम 30:21) 


यह आयत बताती है कि निकाह का असली मक़सद सुकून, मोहब्बत और रहमत है। मियां-बीवी एक-दूसरे के लिए लिबास (कपड़ा) की तरह हैं:"वो तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो।" 

(सूरह अल-बक़रा 2:187) 


यानी एक-दूसरे की खामियों को छुपाना, इज्ज़त की हिफाज़त करना और एक-दूसरे के लिए आराम का सबब बनना।निकाह सुन्नत-ए-रसूल ﷺ हैहज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:"ऐ जवानो! तुम में से जो शादी की ताक़त रखता हो, वो शादी कर ले। क्योंकि यह नज़र को झुकाता है और इज्ज़त (पाकदामनी) की हिफाज़त करता है। और जो शादी की ताक़त न रखता हो, वो रोज़ा रखे, क्योंकि यह उसके लिए ढाल है।" 

(सहीह बुखारी व मुस्लिम) 


एक और मशहूर हदीस में:"निकाह मेरी सुन्नत है। जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, उसका मुझसे कोई ताल्लुक नहीं।" 

(इब्ने माजा, तिर्मिज़ी - हसन हदीस) 


निकाह के कुछ अहम अहकाम (क़ुरआन व हदीस के अनुसार)मेहर देना ज़रूरी है — औरत का हक़ है। क़ुरआन में फरमाया:  "और औरतों को उनका मेहर खुशी से दे दो..." 

(सूरह अन-निसा 4:4) 


फ़िज़ूलख़र्ची हराम है — शादियों में दिखावा, बहुत ज़्यादा खर्चा और कर्ज़ लेकर रस्में करना इस्लाम में मना है।  "फ़िज़ूलख़र्च करने वाले शैतान के भाई हैं।" 

(सूरह अल-इस्रा 17:27) 


दोनों की रज़ामंदी ज़रूरी — लड़की (खासकर कुंवारी) की रज़ा बहुत अहम है। बिना उसकी इजाज़त के निकाह नहीं हो सकता। 

पाकदामनी और नेक नीयत — निकाह सिर्फ़ ज़िना से बचने और इज्ज़त क़ायम रखने के लिए होता है, न कि सिर्फ़ हवस पूरी करने के लिए। 

चार शादियों की इजाज़त — क़ुरआन में है (सूरह अन-निसा 4:3), लेकिन सख्त शर्त के साथ कि सभी पत्नियों के साथ पूरा इंसाफ़ (न्याय) कर सको। अगर इंसाफ़ का डर हो तो सिर्फ़ एक ही काफी है। 


आज के दौर में ज़रूरी बातेंहमारी ज़्यादातर शादियों में रिवाज़ों (हल्दी, महंदी, सगाई, संगीत, बहुत ज़्यादा दावत, डांस आदि) की वजह से फ़िज़ूलख़र्ची और ग़ैर-इस्लामी अमल हो जाते हैं। रसूल ﷺ की शादियां बहुत सादगी से हुईं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि निकाह सुन्नत के मुताबिक़ सादा, नेक नीयत और अल्लाह की रज़ा के लिए हो।अल्लाह हम सबको क़ुरआन और सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए और हमारे निकाह को सुकून, मोहब्बत और रहमत का ज़रिया बनाए। आमीन।अगर आप किसी खास पहलू (जैसे मेहर, तलाक़, हलाला आदि) के बारे में और जानना चाहें तो बताएं! 



इस्लाम में निकाह एक बहुत ही पाक, मुबारक और आसान इबादत है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:"सबसे ज्यादा बरकत वाला निकाह वही है जिसमें खर्च सबसे कम हो।" 

(बयहकी) 


आजकल हमारे समाज में निकाह के नाम पर जो फिजूलखर्ची और गैर-इस्लामी रस्में चल रही हैं, वे शरीयत के खिलाफ हैं और कई बार गुनाह का कारण बन जाती हैं।निकाह की असली सुन्नत क्या है?सिर्फ़ इजाब-ओ-कुबूल (लड़की-लड़के की रजामंदी का ऐलान) 

कम से कम दो गवाह 

मेहर (जो लड़की का हक़ है) 

खुत्बा-ए-निकाह (तक़वा और हक़ूक़ की नसीहत) 

निकाह के बाद वलीमा (दूल्हे की तरफ़ से सादा दावत) 


बस इतना ही काफी है। बाकी ज्यादातर रस्में लोग खुद से या दूसरी कौमों से लेकर आए हैं।आम फिजूलखर्ची और गैर-इस्लामी रस्में (जो अक्सर बिदअत या हराम की श्रेणी में आती हैं)बहुत महँगा मेहर या दिखावे के लिए लाखों-करोड़ों का दहेज/सामान 

डीजे, बैंड-बाजा, नाच-गाना, मिक्स्ड गैदरिंग (संगीत और फहश हरकतें हराम हैं) 

आतिशबाजी, फुलझड़ियाँ, भारी लाइटिंग और डेकोरेशन 

कई दिनों तक लगातार कई फंक्शन (संगीत, मेहंदी, हल्दी, सगाई, रोका, जोड़ा-चढ़ाई आदि) 

बारात लेकर लड़की के घर जाना और वहाँ भारी खर्च 

महँगे मैरिज हॉल, ढेर सारे मेहमानों को बुलाकर दिखावा 

महँगे कपड़े, जेवरात और फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी पर लाखों खर्च 


ये सब दिखावा (रिया), इसराफ़ (फिजूलखर्ची) और कई बार बिदअत हैं। अल्लाह तआला फरमाता है:"और फिजूलखर्ची मत करो, बेशक फिजूलखर्च करने वाले शैतान के भाई हैं।" 

(सूरह अल-आराफ़: ३१) 

सादगी से निकाह के फायदेअल्लाह की रज़ा और बरकत मिलती है 

गरीब-मध्यम वर्ग पर बोझ नहीं पड़ता 

कर्ज़े से बचाव होता है (कर्ज़ बहुत बड़ा गुनाह है) 

समाज में दूसरे गरीब लड़के-लड़कियों के निकाह आसान होते हैं 

पैसा बचाकर सदका, तालीम या किसी अच्छे काम में लगाया जा सकता है 


आज बहुत से इलाकों में मुस्लिम पंचायतें और उलेमा खुद फैसला कर रहे हैं कि डीजे-आतिशबाजी पर रोक 

मैरिज हॉल में निकाह न पढ़ना 

फिजूल रस्मों पर पाबंदी

और उल्लंघन करने वालों का निकाह तक ना पढ़ना 


अगर आप सच में सुन्नत पर अमल करना चाहते हैं तो सादगी ही सबसे बेहतरीन तरीका है। निकाह को इबादत बनाए रखें, दिखावे का तमाशा न बनने दें।अल्लाह हम सबको सुन्नत पर चलने और फिजूलखर्ची से बचने की तौफीक दे। आमीन। 




निकाह इस्लाम में एक बहुत पवित्र और सादगी वाला इबादत है। यह मियां-बीवी के बीच अल्लाह की तरफ से एक मजबूत अहद (contract) है। लेकिन अफसोस कि आजकल कई मुस्लिम समाजों में निकाह के मौके पर ऐसी रस्में और रिवाज़ चल पड़ गए हैं जो शरीयत में बिल्कुल ग़ैर-शरई (un-Islamic), बिदअत (innovation), फिजूलखर्ची, और कई बार बेहयाई (immodesty/indecency) से भरे होते हैं।ये रस्में ज्यादातर हिंदू, ईसाई या पश्चिमी संस्कृति से ली गई हैं या पुरानी जाहिलियत से चली आ रही हैं, जिन्हें इस्लाम ने साफ मना किया है।निकाह के मौके पर आमतौर पर चलने वाली कुछ प्रमुख ग़ैर-शरई और बेहयाई वाली रस्में (जो शरीयत में हराम या मकरूह हैं):


नाच-गाना, डीजे, बैंड-बाजा, म्यूजिक

→ शादी के दौरान या बारात, मेहंदी, संगीत आदि में संगीत बजाना और नाचना सख्त हराम है। यह फितने और बेहयाई का सबसे बड़ा कारण बनता है।


मर्द-औरत का आपस में मिलना-जुलना (Free mixing)

→ मर्द और औरतों का एक साथ बैठना, हाथ मिलाना, नाचना, फोटो खिंचवाना, स्टेज पर साथ आना-जाना — यह सब हराम है।


दुल्हन का खुला प्रदर्शन (Exhibiting the bride)

→ दुल्हन को स्टेज पर बिठाकर सबको दिखाना, फोटो सेशन, मुंह दिखाई, हैवी मेकअप और खुली ड्रेस में सबके सामने आना — यह बेहयाई और नज़रों की हिफाज़त के खिलाफ है।


हल्दी, मेहंदी की रस्में (जैसी हिंदू रस्मों की नकल)

→ हल्दी लगाना, मेहंदी की रस्में, हाथों में मेहंदी लगवाने के लिए गैर-महरम मनिहारिन (गैर मर्द) का हाथ पकड़ना — ये सब बिदअत और कई बार हराम हैं।


बारात में घोड़ी/कार/हाथी पर चढ़ना और शोर-शराबा

→ बहुत फिजूलखर्ची और दिखावा।


दहेज और जेवर चढ़ाने की रस्में

→ लड़की वालों से दहेज लेना सख्त हराम है। उल्टा लड़के वाले लड़की को बहुत भारी मेहर और तोहफे देते हैं तो भी यह रिवाज़ बन जाता है जो ग़लत है।


एंगेजमेंट रिंग, वेडिंग रिंग, वेडिंग केक काटना

→ यह नॉन-मुस्लिमों की नकल है, जो बिदअत है।


फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी (खासकर जिसमें मर्द-औरत साथ हों)

→ जिन्दा तस्वीरें बनाना और वीडियो बनाना (खासकर हराम माहौल में) कई उलेमा के नज़दीक हराम है।


असली शरई निकाह क्या है? (बहुत सादगी वाला)


लड़का-लड़की का राज़ी होना 


वली (लड़की का वली - बाप/दादा आदि) की इजाज़त 


मेहर तय करना और कबूल करना 


इजाब-ओ-कुबूल (offer & acceptance) 


कम से कम दो गवाह (आदमी या एक आदमी + दो औरतें)


बस इतना ही!

रसूलुल्लाह ﷺ और सहाबा के ज़माने में निकाह बहुत सादा होते थे। कई बार तो बस कुछ लोगों के सामने इजाब-कुबूल हो जाता था और वलीमा में कुछ लोग खाना खाते थे।आजकल की ज्यादातर शादियां दिखावा, फिजूलखर्ची और गुनाहों का मेला बन गई हैं। जबकि इस्लाम ने कहा है: 


"शादी को आसान करो, क्योंकि आसानी में बरकत है।" (हदीस)


अगर आप या आपका परिवार सच में अल्लाह और रसूल ﷺ की सुन्नत पर अमल करना चाहता है तो इन बेहयाई और ग़ैर-शरई रस्मों से पूरी तरह परहेज़ करें। निकाह को सादा, शरीयत के मुताबिक और पर्दे की हिफाज़त के साथ अदा करें — यही सबसे बेहतर और बरकत वाला तरीका है।अल्लाह हम सबको सही तरीके से निकाह करने और हलाल रिश्ते निभाने की तौफीक दे। आमीन





कुरआन और हदीस में निकाह (विवाह) का हुक्म बहुत स्पष्ट और महत्वपूर्ण है। 

इस्लाम में निकाह को सुन्नत-ए-मुअक्कदा (बहुत मजबूत सुन्नत) माना जाता है और कई उलेमा के अनुसार सामर्थ्य होने पर यह वाजिब भी है, क्योंकि यह इंसान को गुनाहों से बचाता है, सुकून देता है और समाज की बुनियाद मजबूत करता है।कुरआन में निकाह का हुक्म और अहमियतसबसे साफ हुक्म 

سورۃ النور (24:32) 

وَأَنكِحُوا الْأَيَامَىٰ مِنكُمْ وَالصَّالِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَائِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ 

अनुवाद: "और तुम अपने बीच में जो कुंआरे (अविवाहित) हैं, उनसे निकाह कर दो और अपने नेक (सालेह) गुलामों और लौंडियों से भी। अगर वे गरीब हों तो अल्लाह उन्हें अपने फज़ल से मालदार बना देगा। और अल्लाह बहुत विस्तार करने वाला, सब कुछ जानने वाला है।"इस आयत में "अन्किहू" (निकाह कर दो) का सीधा हुक्म है। 

निकाह का सबसे बड़ा मकसद – सुकून, मोहब्बत और रहमत 

سورۃ الروم (30:21) 

وَمِنْ آيَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجًا لِّتَسْكُنُوا إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُم مَّوَدَّةً وَرَحْمَةً ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ 

अनुवाद: "और उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स से जोड़े पैदा किए ताकि तुम उनके पास सुकून पाओ और तुम्हारे बीच मोहब्बत और रहमत कायम की। बेशक इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो गौर करते हैं।"यही आयत निकाह को सबसे खूबसूरत तरीके से बयान करती है। 

पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए लिबास हैं 

सूरह अल-बकरा (2:187) 


هُنَّ لِبَاسٌ لَّكُمْ وَأَنتُمْ لِبَاسٌ لَّهُنَّ 

अनुवाद: "वे (तुम्हारी बीवियाँ) तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो।" 


हदीस में निकाह की ताकीद और फज़ीलतनिकाह मेरी सुन्नत है 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि. से रिवायत है, नबी ﷺ ने फरमाया: 

"النِّكَاحُ مِنْ سُنَّتِي، فَمَنْ لَمْ يَعْمَلْ بِسُنَّتِي فَلَيْسَ مِنِّي" 

"निकाह मेरी सुन्नत है। जिसने मेरी सुन्नत पर अमल नहीं किया, वह मुझसे नहीं।" 

(सुनन इब्ने माजा, तिर्मिज़ी – सही) 

जवानों के लिए हुक्म 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि. से: 

नबी ﷺ ने फरमाया: 

"يا معشر الشباب، من استطاع منكم الباءة فليتزوج، فإنه أغض للبصر وأحصن للفرج، ومن لم يستطع فعليه بالصوم فإنه له وجاء" 

"ऐ जवानो! तुम में से जो शादी की सामर्थ्य रखता हो, वह निकाह कर ले, क्योंकि यह नज़र को झुकाने वाला और शर्मगाह की हिफाज़त करने वाला है। और जो सामर्थ्य न रखता हो, वह रोज़ा रखे क्योंकि यह उसके लिए ढाल है।" 

(सहीह बुखारी व मुस्लिम) 

निकाह आधा दीन पूरा करता है 

नबी ﷺ का इरशाद: 

"إذا تزوج العبد فقد استكمل نصف دينه، فليتق الله في النصف الباقي" 

"जब बंदा निकाह कर लेता है तो उसने अपना आधा दीन पूरा कर लिया, अब उसे चाहिए कि बाकी आधे में भी अल्लाह से डरे।" 

(मिश्कात) 


संक्षेप में निकाह का हुक्मस्थिति 

हुक्म का दर्जा 

मुख्य दलील 

सामर्थ्य होने पर (शारीरिक, आर्थिक) 

वाजिब / बहुत ज़ोरदार सुन्नत 

सूरह नूर 24:32 + हदीस 

सामर्थ्य न होने पर 

मक्रूह / नापसंद 

रोज़े की ताकीद 

सिर्फ इबादत के लिए अविवाहित रहना 

गलत / नापसंद 

"जो मेरी सुन्नत नहीं करता..." 

निकाह का मकसद 

सुकून, इफ्फत, औलाद, दीन की हिफाज़त 

सूरह रूम 30:21 


इसलिए इस्लाम निकाह को बहुत पसंद करता है और इसे आसान, सादा और सुन्नत के मुताबिक करने की ताकीद करता है। 

अल्लाह हम सबको अपनी सुन्नत पर चलने और नेक जोड़े बनाने की तौफीक अता फरमाए। आमीन। 




इस्लाम में फ़िज़ूल खर्ची (इसराफ़ / تبذیر) को बहुत बुरा और नापसंद किया गया है। क़ुरआन और हदीस में इसे साफ़ मना किया गया है और इसे शैतान के रास्ते से जोड़ा गया है।यहाँ कुछ अहम क़ुरआनी आयतें और हदीसें हैं जो फ़िज़ूलख़र्ची पर रोशनी डालती हैं:क़ुरआन मजीद से आयतेंसूरह अल-इस्रा (17:26-27) 

وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا ۝ إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا 

अनुवाद: और फ़िज़ूलख़र्ची न करो। बेशक फ़िज़ूलख़र्च करने वाले शैतान के भाई हैं और शैतान अपने रब का बहुत बड़ा नाशुक्रा रहा है। 

→ यहाँ सबसे सख़्त लफ़्ज़ इस्तेमाल हुए हैं — फ़िज़ूलख़र्च करने वाले को शैतान का भाई कहा गया है! 

सूरह अल-अराफ़ (7:31) 

يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ 

अनुवाद: ऐ आदम की औलाद! हर मस्जिद के पास अपनी ज़ीनत (सज-धज) अपनाओ और खाओ-पियो, मगर फ़िज़ूलख़र्ची न करो। बेशक अल्लाह फ़िज़ूलख़र्च करने वालों को पसंद नहीं करता। 

सूरह अल-फ़ुरक़ान (25:67) 

وَالَّذِينَ إِذَا أَنْفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا 

अनुवाद: और जो लोग खर्च करते हैं तो न फ़िज़ूलख़र्ची करते हैं और न कंजूसी, बल्कि इन दोनों के बीच इत्तेदाल (मध्य मार्ग) पर रहते हैं। 

→ यही असली मोमिन की ख़ूबी है — न कंजूस, न फ़िज़ूलख़र्च! 


कुछ मशहूर हदीसेंहज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फरमाया: 

«كُلُوا وَاشْرَبُوا وَالْبَسُوا وَتَصَدَّقُوا فِي غَيْرِ إِسْرَافٍ وَلَا مَخِيلَةٍ» 

(खाओ, पियो, पहनो और सदक़ा दो, मगर इसराफ़ (फ़िज़ूलख़र्ची) और दिखावे के बिना।) — (इब्ने माजा, हाकिम) 

पानी की बर्बादी के बारे में: 


नबी ﷺ ने फरमाया: 

«لَا تُسْرِفْ وَإِنْ كُنْتَ عَلَى نَهْرٍ جَارٍ»

(फ़िज़ूलख़र्ची मत करो, चाहे तुम बहते हुए नदी के किनारे पर वज़ू कर रहे हो।) — (इब्ने माजा) 


इस्लाम हमें इत्तेदाल (मध्य मार्ग) सिखाता है — न कंजूसी, न बेकार की फ़िज़ूलख़र्ची। चाहे खाने में हो, कपड़ों में, शादी-ब्याह में, या किसी भी चीज़ में — सब में संतुलन ज़रूरी है।अल्लाह हमें फ़िज़ूलख़र्ची से बचाए और इत्तेदाल पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन। 


#Nikah #Shadi #Walima #Peception #Wedding #Marriage #Dulhan #Dulha #Bride #Groom


कोई टिप्पणी नहीं: